






1 घंटे पहलेलेखक: आशीष तिवारी/वीरेंद्र मिश्र
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स्पोर्ट्स से मॉडलिंग और फिर एक्टिंग, हर किरदार में दिखी मुकेश ऋषि की जुनून और मेहनत की कहानी।
फिल्मों में अपने खलनायक किरदारों से घर-घर पहचान बनाने वाले मुकेश ऋषि की कहानी संघर्ष और लगन की मिसाल है। कठुआ (जम्मू-कश्मीर) में 19 अप्रैल 1956 को जन्मे मुकेश शुरू से ही स्पोर्ट्स और फिटनेस के शौकीन थे। स्कूल के दिनों में वे तेज गेंदबाज रहे और पढ़ाई के बाद चंडीगढ़ से एम.ए. किया। नौकरी की तलाश उन्हें मुंबई ले आई, जहां कुछ साल काम करने के बाद वे फिजी चले गए।
वहीं उन्होंने शादी की और अपने लंबे कद-काठी के कारण मॉडलिंग शुरू की। फिजी और न्यूजीलैंड में सात साल मॉडलिंग करने के बाद उन्होंने मुंबई लौटकर रोशन तनेजा एक्टिंग स्कूल में प्रशिक्षण लिया। यश चोपड़ा की फिल्म ‘परंपरा’ से अभिनय की शुरुआत करने वाले मुकेश ऋषि ने बॉलीवुड और दक्षिण भारतीय फिल्मों में विलेन और कैरेक्टर रोल्स से अपनी अलग पहचान बनाई।
आज की सक्सेस स्टोरी में जानेंगे मुकेश ऋषि के कुछ अनसुने किस्से, उन्हीं की जुबानी…

क्रिकेट और स्पोर्ट्स ने बहुत कुछ सिखाया
लोग कहते हैं कि मैं हमेशा फिट और फ्रेश दिखता हूं, लेकिन इसमें कोई खास राज नहीं है। मैं बस अपने नेचर के मुताबिक जीता हूं, और सब कुछ अपने आप ठीक हो जाता है। क्रिकेट और स्पोर्ट्स ने मुझे बहुत कुछ सिखाया, खासकर टीमवर्क और डिसिप्लिन। मैदान की फीलिंग अलग ही होती है, जहां सब एक साथ खेलते हैं। शायद उसी खेल की आदत और छोटे शहर का अपनापन आज भी मुझे जमीन से जोड़े रखता है।
खेल से जीवन में डिसिप्लिन का महत्व समझा
मैं चंडीगढ़ में था तब, वहीं ग्रेजुएशन की थी। मैं क्रिकेट में बहुत सक्रिय था और फास्ट बॉलर भी था। तब बहुत जोश था। कोच कहते थे कि ज्यादा एक्सरसाइज मत करो, लेकिन उस वक्त मेरी समझ नहीं आती थी। मैं बस वही करता था जो मुझे मजा देता था। बाद में पता चला कि कोच क्यों मना करते थे। अगर कंधा ज्यादा मजबूत हो जाता है, तो हाथ पूरी तरह ऊपर नहीं उठ पाता, जो गेंदबाजी के लिए जरूरी होता है। तब जाकर समझ आया।
फिर मैंने स्पिन गेंदबाजी शुरू कर दी। कॉलेज में जितने भी खेल में हिस्सा ले सकता था, लिया। दौड़ना हो या कोई एक्सरसाइज, जो भी फिटनेस से जुड़ा था, करता रहा। मैं ऐसे माहौल में रहना पसंद करता था। दोस्त थे, मस्ती होती थी, मजा आता था। कुछ साल बाद मैं बाहर भी गया। फिजी आइलैंड में रहा एक वक्त। लेकिन स्पोर्ट्स की वो आदत और डिसिप्लिन वहीं से मिली, जो आगे की जिंदगी में जैसे साथ ही चलती रही।
लगा मुझे अपनी राह खुद बनानी चाहिए
उस वक्त खेल की भावना और अनुशासन दोनों थे। जो भी किया, बहुत मेहनत से किया। फिजी जाने की कहानी भी ऐसी ही रही। असल में प्यार था, लेकिन ज्यादा विकल्प नहीं थे। बाकी हर चीज में मजबूती थी, पर जिंदगी का सही रास्ता नहीं मिल पा रहा था। शायद उसी तलाश में बाहर चला गया।
मेरी जो दोस्त थीं, वही बाद में मेरी पत्नी बनीं। शायद उन्हीं की वजह से लगा कि कुछ वहां कर पाऊं। फिजी में कुछ समय बिताने के बाद मैं न्यूजीलैंड पहुंच गया। वहां एक फायदा यह हुआ कि मैंने कैटवॉक और फैशन का कोर्स किया था, तो वहां पहुंचते ही काम मिलना शुरू हो गया।
इससे आत्मविश्वास बढ़ा, लगा कि मेरे पास कुछ ऐसा है जो सच में मेरा है, जिसे मैं महसूस कर रहा हूं। क्योंकि इससे पहले कभी किसी के अधीन नौकरी नहीं की थी। पिता जी ने मेहनत से हमें सब कुछ दिया था, लेकिन अब लगा कि मुझे अपनी राह खुद बनानी चाहिए।

देसी नेचुरल स्किन की पहचान ने हौसला दिया
न्यूजीलैंड की दुनिया अलग थी। अंग्रेजी बोलने वाले, उनके तरीके, सोच और सिस्टम अलग थे। लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि मैं वहां फिट हो सकता हूं। वहां के जो बड़े मॉडल थे, नामी लोग थे, उनके बीच भी मैंने अपनी जगह बना ली। उन्होंने मुझे उत्साहित किया। एक दिन उन्होंने कहा-“तुम्हें शायद पता नहीं, तुम्हारी स्किन इस काम के लिए परफेक्ट है।”
मैं हैरान हुआ, पूछा-“कैसे?” तब उन्होंने बताया कि वहां के मॉडल्स को किसी फंक्शन या शूट से कम से कम 24 घंटे पहले बताना पड़ता है, क्योंकि उन्हें टैनिंग करनी होती है। लेकिन मुझे वहां रहकर भी टैनिंग की जरूरत नहीं पड़ती थी। यह मेरी नेचुरल क्वालिटी थी। उस दिन समझ आया कि मेरी पहचान और खूबियां शायद मुझसे ज्यादा दूसरों की नजरों में थीं।
जो गोरे लोग होते हैं, वे स्टेज पर आने से पहले खुद को टैन करते थे ताकि वे फोटोजेनिक दिखें। लेकिन हमारे साथ यह देसी तौर पर था, नेचुरल। हमारी त्वचा वाकई वैसी ही थी। लोग हमें काला कहते थे, पर सच कहूं तो हमारी त्वचा उनसे बेहतर थी। छोटी-छोटी बातें थीं, लेकिन इन्हीं बातों से हौसला मिला। लगता था, यही चीज है जिससे मेरा दिल सच में धड़कता है, वही जो अंदर से महसूस होता था, उसी रास्ते पर मेरा सब कुछ चल रहा था।
अंग्रेजी इंडस्ट्री से बेहतर अपनी भाषा की इंडस्ट्री लगी
मेरा पहले कोई लक्ष्य साफ नहीं था, लेकिन एक वक्त आया जब मैंने अपना लक्ष्य देखा। जिंदगी में कभी-कभी रास्ता साफ नहीं होता, यही दौर मैंने भी देखा। इसलिए कह सकता हूं कि दिशा समझने में टाइम लगता है।
जब समझ आया कि क्या करना है, तो मैं उसी रास्ते पर चल पड़ा। मुंबई में पहले से था, पिता का बिजनेस था, परिवार साथ था, माहौल समझ आया। बाहर से वापस आकर सब साफ हो गया। घर वहां है, इंडस्ट्री यहीं है। अंग्रेजी इंडस्ट्री से बेहतर लगा कि अपनी भाषा की इंडस्ट्री में काम करूं। पत्नी ने मेरा बहुत सपोर्ट किया।
पत्नी हमेशा एक सपोर्ट सिस्टम रही हैं
वो मेरे लिए हमेशा एक सपोर्ट सिस्टम रही हैं, बहुत समझने वाली। कई बार होता है ना कि हम मर्द सोच लेते हैं कि घर तो हमें ही चलाना चाहिए, वही जिम्मेदारी हमारी है। लेकिन उनके लिए ऐसी कोई दिक्कत नहीं थी। वो बहुत एजुकेटेड हैं, वहां पली-बढ़ी हैं, सब कुछ समझती हैं। काम की कोई कमी नहीं थी उनके पास। तो जब उन्होंने मुझे वो आजादी दी, वो समझ दी। तो मुझे लगा कि उसके लिए उनको बहुत बड़ा क्रेडिट जाता है।
लगातार सीखते रहने से आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली
मैंने शुरू में थोड़ा मॉडलिंग किया था, फिर इंडस्ट्री बदलकर देश छोड़कर आना आसान नहीं था। मेरी पत्नी वहीं पढ़ती थीं, हम वहीं मिले, और उनका समझदारी भरा नजरिया मुझे बहुत पसंद आया। मुंबई आने के बाद मैंने ठाना कि अब सोच-समझकर और एक दिशा में काम करूंगा। एक्टिंग के लिए रोशन तनेजा साहब का कोर्स और मधुमती जी का डांस क्लास शुरू किए। मन में यह पक्का था कि चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, मुझे इसी राह पर चलना है।
आपने मेहनत और सीखने की आदत को सबसे ऊपर रखा। शुरुआत में घर से बाहर जाकर मेहनत की, अपनी कमजोरियां समझीं और लगातार सीखते रहे। टेलीविजन सीरियल “टीपू सुल्तान” में काम करने का मौका मिला, जहां अपनी कमियों को स्वीकारा और उनसे सीख लिया। फिर फिल्म ‘मेरी गर्दिश’ के सेट पर अपनी पूरी मेहनत और अनुभव के साथ गलती न करने का संकल्प लिया। यह लगन और पक्का इरादा था कि लगातार सीखते रहेंगे और आगे बढ़ेंगे।
डर को कमजोरी नहीं, ताकत का हिस्सा माना
ईमानदारी से पहचान बनाई। पिता की तरह ट्रांसपोर्ट में नहीं गया, क्योंकि उसमें मेरी रुचि नहीं थी। मैंने खुद से कभी झूठ नहीं बोला और अपनी कमजोरियों को भी स्वीकारा। डर को कमजोरी नहीं, ताकत का हिस्सा माना। यह सबक बेटे को भी दिया कि अपने आप से झूठ मत बोलो, डर लगे तो भी सच के साथ जाओ। असली डर डायरेक्टर के “वन मोर” कहने में है, वही तुम्हें आगे बढ़ाता है। ईमानदारी ही मेरा रास्ता रही, इसी ने मुझे मुश्किलों से निकाला और आज तक मजबूत रखा है।
प्रियदर्शन ने भरोसा किया और गर्दिश में मिला बड़ा मौका
जब मैं पहली बार प्रियदर्शन जी से फिल्म ‘गर्दिश’ के लिए मिलने गया, तो उनके साथ प्रोड्यूसर आर. मोहन साहब भी थे। उन्होंने मुझे देखते ही कहा कि यही लड़का ठीक रहेगा। उनकी पहली शर्त थी कि जो भी रोल करे, वो फिट और वेल-बिल्ट होना चाहिए। जब उन्होंने मुझे देखा, तो तुरंत ओके कर दिया। मुझे खुद यकीन नहीं हुआ कि इतना जल्दी फैसला हो गया।
फिर उन्होंने मुझे डीओपी संतोष जी से मिलवाया। सेट पर जाकर लगा कमाल है। वहां बहुत ईमानदारी और भरोसे से सब हुआ। प्रियदर्शन जी जैसे डायरेक्टर अपने काम पर कितना भरोसा रखते हैं, समझ आया। उन्होंने मुझसे एक्टिंग में कोई दबाव नहीं डाला, बस कहा जो चाहिए था वो तेरे शरीर और लुक में है, बाकी मैं निकाल लूंगा। सच में वही हुआ। मैं आज भी प्रियदर्शन जी की बहुत इज्जत करता हूं।

स्ट्रगल के दौर में कई फिल्में ऑफर हुईं, लेकिन नहीं बनी
जब मैं स्ट्रगल के दौर में था। कई लोगों से मिलना-जुलना हो रहा था। शेखर कपूर भी सनी देओल के साथ ‘चैंपियन’ फिल्म में मुझे लॉन्च करने वाले थे। फिरोज नाडियाडवाला ने भी कहा था कि वो मुझे लॉन्च करेंगे। उस समय मेरी बॉडी पूरी स्पोर्ट्स वाली थी। इसी वजह से कई डायरेक्टर्स मुझमें एक्शन वाली छवि में देख रहे थे।
मेरा लुक थोड़ा अलग था, छोटे बाल, सादी स्टाइल, लेकिन ये सब जानबूझकर था। उस समय ब्लैक एंड वाइट फोटोशूट का दौर था, कलर्ड फोटो हम ज्यादा नहीं करवाते थे। वही चीज मेरी पहचान बन गई।
शेखर साहब की ‘चैंपियन’ स्पोर्ट्स पर थी। उसमें एथलीट का रोल था, और उन्हें लगा कि मेरा लुक उस रोल के लिए एकदम फिट है। उनसे मिलकर अच्छा लगा, वो बहुत बड़े डायरेक्टर थे। फिल्म बाद में नहीं बन पाई या देर हो गई, वो अलग बात है, लेकिन उस समय मुझे अच्छा मोटिवेशन मिला।
बीच में चीजें थोड़ी स्लो चलती रहीं, फिर अचानक एकसाथ कई काम मिलने लगे। जो प्रोजेक्ट सबसे देर में मिली थी, वही सबसे पहले शुरू हो गई। मुझे कभी डर नहीं लगा कि अगर एक फिल्म साइन की है तो दूसरी नहीं कर सकता, क्योंकि किसी के साथ कोई लिखित प्रॉमिस नहीं था। इसलिए कॉन्फिडेंस बना रहा और मैंने हर मौके को खुले दिल से अपनाया।
मेरे हिसाब से जो कुछ भी होता है, वो किस्मत में लिखा होता है। उस वक्त यश चोपड़ा की ‘परंपरा’ फिल्म की शूटिंग में मुझे घोड़े पर एक सीन करना था। रोल बड़ा नहीं था, लेकिन पूरा सीन घोड़े का था। शूटिंग के दौरान गिरने की वजह से थोड़ी दिक्कत हुई, लेकिन पीछे मुड़कर देखूं तो लगता है, वही किस्मत थी।
असल में मैं फिरोज नाडियाडवाला जी के ऑफिस जाया करता था, वो बहुत इज्जत से मिलते थे। उन्होंने ही कहा कि चलो, शुरुआत करते हैं। अगर मैं उस सीन में नहीं गिरता, तो शायद कुछ और प्रोजेक्ट्स में उलझ जाता, और फिर ‘गर्दिश’ जैसी फिल्म शायद मुझे उस वक्त नहीं मिलती।
तो मुझे लगता है कि ऊपर वाला कुछ न कुछ तय करता है। मैंने बस इतना सोचा कि जो भी हो, एक चीज पर ध्यान दो और उसे पूरे दिल से करो, और वही करता गया। जो होना था, वही हुआ।
जितनी जरूरत हो, उतनी पब्लिसिटी
आमिर हमेशा से बहुत परफेक्शनिस्ट रहे हैं। उनके साथ काम करना अपने आप में सीखने जैसा था। हम सेट पर बातें करते थे, वहीं उन्होंने मुझे ‘सरफरोश’ की कहानी भी एक बार सुनाई थी। आमिर का स्वभाव ऐसा है कि वे हर सीन में मौजूद रहते हैं, मगर कभी जबरदस्ती गाइड नहीं करते। वो भरोसा रखते हैं कि डायरेक्टर सही फैसला करेगा। बस उनकी मौजूदगी से काम और आसान लगता था।
सरफरोश में मेरा रोल इंस्पेक्टर सलीम का था, जो बहुत अच्छा लिखा गया किरदार था। इस किरदार को लेकर थोड़ी झिझक थी, वही डर किरदार में दिखाया। सलीम का दर्द यही था कि गलती किसी की हो, नाम पर सवाल न उठे, यही उसकी सच्चाई थी।
मैंने आमिर से एक बार पब्लिसिटी पर राय ली थी। उन्होंने कहा था कि हीरो को ज्यादा पब्लिसिटी करनी पड़ती है क्योंकि पूरी फिल्म उसी से जुड़ी होती है, लेकिन बाकी किरदारों के लिए उतनी जरूरत नहीं होती। उनकी ये बात मुझे आज भी सही लगती है, मैं आज भी उसी तरह फॉलो करता हूं। जितनी जरूरत हो, उतनी पब्लिसिटी।

‘सरफरोश’ के बाद मुझे साउथ से काम के ऑफर आने लगे
‘सरफरोश’ के बाद मुझे साउथ से काम के ऑफर आने लगे। उस वक्त मैं ये सोचता नहीं था कि मुंबई से काम नहीं आ रहा और साउथ से आ रहा है। मेरे लिए काम काम होता है। चाहे घर मुंबई में हो या हैदराबाद में, मेहनत तो वही है।
मुझे जो भी मौके मिले, उन्हें दिल से और ईमानदारी से स्वीकार किया। किसी ने खास गाइड नहीं किया, लेकिन ऊपर वाला रास्ता दिखाता है। जब आप दिल से काम करते हो, तो चीजें अपने आप होने लगती हैं।
मैंने तेलुगु फिल्मों से शुरुआत की, बालाकृष्ण और चिरंजीवी जैसे बड़े नामों के साथ काम किया, जिससे मुझे पूरे इंडिया में पहचान मिली। फिर तमिल, मलयालम, कन्नड़ में भी काम करने का मौका मिला। मुझे लगता है कि काम का कोई बंधन नहीं होना चाहिए। जहां सम्मान मिले, अच्छा रोल मिले और मेहनत की कदर हो, वहां काम करना चाहिए।
यही वजह है कि मेरे काम में वैरायटी आई और हर फिल्म में मेरा विलेन का रोल अलग-अलग होता था। ये फैसला मेरे लिए बिल्कुल सही रहा।
हर स्टार का ‘विलेन’ मैं ही रहा हूं
बॉलीवुड हो या फिर साउथ की फिल्म इंडस्ट्री हर जगह जो काम मिला ईमानदारी से करता गया। जैसे सनी देओल जी के साथ ‘इंडियन’ फिल्म की थी। वह पहले तमिल में बनी थी, और उसी डायरेक्टर ने मुझे हिंदी में भी वही रोल दिया था।
कई तेलुगु हिट फिल्में कन्नड़ में रीमेक हुईं, और उनमें भी मैंने काम किया। ‘सन ऑफ सरदार’ जब कन्नड़ में बनी थी, तब मैंने वह रोल किया था जो बाद में हिंदी में संजय दत्त जी ने किया।
हिंदी और साउथ फिल्मों के सेट में असल में कोई बड़ा फर्क नहीं है, बस वहां डिसिप्लिन थोड़ा ज्यादा होता है। समय पर पहुंचने की आदत यहां सीखी, वही वहां बहुत काम आई। अमिताभ बच्चन के साथ काम करना अपने-आप में एक बड़ी बात थी। उनका डिसिप्लिन तो सब जानते हैं। वो हमेशा टाइम पर आते थे।
बच्चन साहब के साथ फिल्म ‘सूर्यवंशम’ में काम करने का तो एक अलग ही अनुभव रहा है। इस फिल्म में उनका उनका डबल रोल था, गेटअप बदलते थे तो एकदम अलग दिखते थे। हालांकि इस फिल्म से पहले बच्चन साहब के साथ कोहराम,मृत्युदाता और लाल बादशाह जैसी फिल्मों में काम कर चुका था।
मैंने लगभग हर बड़े स्टार और उनके बच्चों के साथ काम किया है। बच्चन साहब से लेकर सनी देओल, खान्स, अक्षय कुमार तक। साउथ में चिरंजीवी जी की पूरी फैमिली, पवन कल्याण, और उनके भाइयों-बच्चों सबके साथ काम किया है। एन.टी. रामाराव साहब की फैमिली के साथ भी। कहा जाए तो हर स्टार का विलेन मैं ही रहा हूं।

रिश्तों में सच्चाई बहुत जरूरी है
मेरे ज्यादातर को-स्टार्स से काम के दौरान अच्छा रिश्ता रहा, लेकिन मैं किसी पर ज्यादा जोर नहीं डालता। जहां जितनी नजदीकी बनी, वहीं तक रखी। सलमान जैसे दोस्तों के साथ कभी-जिम में वक्त गुजार लेता था। पहले सब साथ बैठते थे, अब दूरियां बढ़ गई हैं, पर फर्क नहीं पड़ता। रिश्तों में सच्चाई जरूरी है।
जिंदगी में रिटायरमेंट जैसी कोई चीज नहीं होती
मैं मानता हूं कि जिंदगी में रिटायरमेंट जैसी कोई चीज नहीं होती। काम करते रहना ही इंसान की असली ताकत है। जिंदगी के हर अनुभव से कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। बचपन की मेहनत और संघर्ष आज भी मुझे मजबूत बनाते हैं। मैंने बिजनेस छोड़कर एक्टिंग चुनी, डर था पर मेहनत ने साथ दिया।
एक्टर को एथलीट जैसी नेचुरल फिटनेस रखनी चाहिए। मेरे लिए सफलता वही है कि मैंने वही किया जो चाहता था। जब तक लोग देखना चाहते हैं, काम करता रहूंगा। मेहनत पर भरोसा रखो और अपनी ताकत पहचानों,यही असली सफलता है।
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सोनाली बेंद्रे की मुस्कान आज भी उतनी ही ताजी और प्यारी है जितनी 90 के दशक में थी। एक मिडिल-क्लास महाराष्ट्रीयन घर से आने वाली बेटी ने अपने दिल में हमेशा फिल्मों में काम करने का एक ख्वाब संजोया था। उन्होंने अपने पिता से कहा था, ‘बस तीन साल का मौका दो, नहीं तो मैं पढ़ाई पूरी करके आईएएस की तैयारी करूंगी।’ वह तीन साल नहीं बल्कि अपनी पूरी जिंदगी इस सपने के लिए समर्पित कर गईं।पूरी खबर पढ़ें….
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