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Astrophysicist Prof Jayant Narlikar awarded the ‘Vigyan Ratna Award’ posthumously | एस्ट्रोफिजिसिस्ट प्रो जयंत नार्लीकर को मरणोपरांत ‘विज्ञान रत्न पुरस्कार’: BHU और कैम्ब्रिज से पढ़ाई की, बिग बैंग थ्योरी को चुनौती दी; जानें कप्लीट प्रोफाइल


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1 घंटे पहले

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भारत के मशहूर एस्ट्रोफिजिसिस्ट यानी खगोल भौतिक विज्ञानी जयंत नार्लीकर को मरणोपरांत ‘विज्ञान रत्न पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने बिग बैंग थ्योरी को चुनौती दी थी। केंद्र सरकार ने शनिवार, 25 अक्टूबर को इसकी घोषणा की।

केंद्र ने पद्म पुरस्कारों की तर्ज पर शुरू किए गए राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार 2025 की घोषणा की है। इस साल कुल 23 वैज्ञानिकों और एक टीम को सम्मानित किया जाएगा। ये साइंस एंड टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में देश के सर्वोच्च पुरस्कार हैं।

पिता BHU के मैथ्स डिपार्टमेंट में HOD थे

प्रो. जयंत नार्लीकर के पिता विष्णु वासुदेव नार्लीकर मैथेमेटिशियन और थ्योरिटिकल फिजिसिस्ट थे। वो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के मैथ्स डिपार्टमेंट में HOD थे। उनकी मां सुमाती नार्लीकर संस्कृत की स्कॉलर रहीं। नार्लीकर ने मंगला नार्लीकर से विवाह किया था, जो मैथमेटिक्स की रिसर्चर और प्रोफेसर थीं। दोनों की तीन बेटियां हैं।

कैम्ब्रिज से PhD की थी

BHU से BSc की डिग्री हासिल करने के बाद, नार्लीकर हायर एजुकेशन के लिए इंग्लैंड चले गए। यहां उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज में एडमिशन लिया। वो फिट्जविलियम कॉलेज के स्टूडेंट थे।

नार्लीकर ने 1959 में मैथमैटिकल ट्राईपॉस पूरा किया। इसके लिए उन्हें मैथ्स में बैचलर ऑफ आर्ट्स (BA) की डिग्री और सीनियर रैंगलर का सम्मान मिला।

नार्लीकर ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में अपने रिसर्च करियर की शुरुआत थ्योरिटिकल कॉस्मोलॉजी (सैद्धांतिक ब्रह्मांडशास्त्र) में की। फिर मशहूर एस्ट्रोनॉमर ‘सर फ्रेड हॉयल’ के गाइडेंस में PhD की।

हॉयल ने तारों में नाभिक-संश्लेषण (Stellar Nucleosynthesis) का सिद्धांत प्रतिपादित किया था।

हॉयल-नार्लीकर सिद्धांत पेश किए

नार्लीकर ने अपने गाइड फ्रेड हॉयल के साथ मिलकर गुरुत्वाकर्षण का हॉयल-नार्लीकर सिद्धांत प्रतिपादित किया। यह सिद्धांत आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत का एक वैकल्पिक मॉडल था, जिसका उद्देश्य माख सिद्धांत (Mach’s Principle) को शामिल करना था।

बिग बैंग थ्योरी को किया था चैलेंज

प्रोफेसर जयंत नार्लीकर और फ्रेड होयले ने होयले-नर्लीकर थ्योरी ऑफ ग्रैविटी दी थी। ये थ्योरी सीधे तौर पर बिग बैंग थ्योरी को चैलेंज कर रही थी। इसमें कहा गया था कि यूनिवर्स की कोई शुरुआत और अंत नहीं है।

ये हमेशा से एग्जिस्ट करता रहा है। केवल लगातार बड़ा हो रहा है। लगातार नया मैटर बन रहा है लेकिन क्योंकि यूनिवर्स फैल रहा है, तो डेंसिटी में बदलाव नहीं हो रहा। होयले-नार्लीकर थ्योरी बिग बैंग थ्योरी के मुकाबले मैथेमैटिकली ज्यादा मजबूत थी।

वहीं, बिग बैंग थ्योरी कहती है कि करीब 14 बिलियन साल पहले हॉट-डेन्स पॉइंट से यूनिवर्स की शुरुआत हुई और तभी से यूनिवर्स फैल रहा है।

प्रो नार्लीकर ने साल 1966 में फ्रेड हॉयल के साथ मिलकर इंस्टीट्यूट ऑफ थ्योरिटिकल एस्ट्रोनॉमी स्थापित की। इस दौरान वे किंग्स कॉलेज में फेलो रहे। हालांकि, साल 1972 में यूनिवर्सिटी लीडरशिप के साथ विवाद के कारण हॉयल ने इस्तीफा दे दिया। फिर इंस्टीट्यूट ऑफ थ्योरिटिकल एस्ट्रोनॉमी को इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोनॉमी, कैम्ब्रिज में मर्ज कर दिया गया।

TIFR में प्रोफेसर रहे

इसके बाद प्रो. नार्लीकर भारत लौटे और मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में प्रोफेसर बने। TIFR में उन्होंने थ्योरिटिकल एस्ट्रोफिजिक्स ग्रुप को लीड किया।

प्रो. नार्लीकर 1981 में वर्ल्ड कल्चरल काउंसिल के संस्थापक सदस्य थे। 1994 में इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के कॉस्मोलॉजी कमिशन के अध्यक्ष रहे।

प्रो. नार्लीकर 1981 में वर्ल्ड कल्चरल काउंसिल के संस्थापक सदस्य थे। 1994 में इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन के कॉस्मोलॉजी कमिशन के अध्यक्ष रहे।

IUCAA, पुणे की स्थापना की

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन यानी UGC के इनविटेशन पर, उन्होंने साल 1988 पुणे में इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA) की स्थापना की। वो 2003 तक इसके फाउंडिंग डायरेक्टर रहे। इस संस्थान का उद्देश्य देश भर की यूनिवर्सिटीज में खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी को बढ़ावा देना था।

आत्मकथा को मिला साहित्य अकादमी

पद्म भूषण (1965) और पद्म विभूषण (2004) समेत प्रो. नार्लीकर को तमाम सम्मान मिले। इनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी शामिल है।

  • 1960 में कैम्ब्रिज में खगोल विज्ञान के लिए टायसन मेडल मिला।
  • 1962 में कैम्ब्रिज में डॉक्टरेट के दौरान स्मिथ प्राइज से सम्मानित हुए।
  • 1978 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार मिला।
  • 1989 में आत्माराम पुरस्कार मिला, जो केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा दिया जाता है।
  • 1990 में इंदिरा गांधी पुरस्कार, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी से।
  • 1996 में यूनेस्को का कलिंगा पुरस्कार, विज्ञान के प्रसार के लिए।
  • 2010 में महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार।
  • 2014 में मराठी में लिखी आत्मकथा ‘चार नगरांतले माझे विश्व’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार।

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